Monday, 21 December 2009

सोचती हूँ कि मैं



सोचती  हूँ  कि   मैं   सोचना  छोड़   दूँ 
या तो  फिर  सोच की  सब  हदें तोड़ दूँ 

जिस  तरफ़  एक  तूफ़ान  उठने  को  है 
उस तरफ़ अपनी कश्ती का रुख़ मोड़ दूँ 

गर मुहब्बत न  रिश्तों  की  मोहताज  हो 
सारे    रिश्ते    यहीं - के - यहीं   तोड़   दूँ

टूट  कर  चाहने  का   मैं  क्या  दूँ  सिला 
तुम   मुझे  तोड़  दो,   मैं   तुम्हे  जोड़  दूँ

मुझ से आजिज़ हैं सब ,ख़ुद से आजिज़ हूँ मैं 
क्या    करूँ   ख़ुद  को  मैं  अब  कहाँ  छोड़  दूँ

दीप्ति मिश्र 

4 comments:

Anonymous said...

kya kehne hai wahhhh

Anonymous said...

kya kehne hai wahhhh

Anonymous said...

kya kehne hai wahhhh

me said...

Shukriya vikas ji.