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Tuesday, 22 December 2009

DHARM

धर्म 


दाढ़ी और टोपी ,टीका और चोटी 
देख कर -----
मुझमें छुपी नन्ही-सी बच्ची 
डर जाती है !
और मेरा वयस्क मन --
कसैला हो जाता है !
'अज़ान' और 'आरती' की आवाजें 
बम-विस्फ़ोटों और गोलियों की धाँय-धाँय  से 
लिपट कर ,कुछ ऐसे गरजती हैं  
जैसे चन्दन से लिपटा विषैला नाग 
फन उठाए फुफकार रहा हो !!

बचपन में माँ अक्सर कहतीं थीं -
"बिटिया! सदा धर्म का पालन करना,
अपना धर्म कभी मत छोड़ना"
तब समझ ही नहीं पाती थी 
कि वास्तव में ये "धर्म" है क्या ?

आज भी नहीं समझ पाई हूँ !
हाँ इतना ज़रूर जान गई हूँ 
कि "अधर्म"के जन्म का आधार है 
"धर्म"!!!!
तुम्हारा -मेरा ,इसका-उसका 
हम सबका "धर्म"!!

"धर्म" से "अधर्म" तक की यात्रा तो हो चुकी 
आओ !अब एक नई शुरुआत करें 
"अधर्म" के माध्यम से ---
'धर्म" के सही अर्थ को ग्रहण करें 
और ज़ख़्मी इंसानियत के 
रिसते हुए घावों पर 
स्नेह का फाहा धरें !!!

दीप्ति मिश्र