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Monday, 7 December 2009

अहिल्या

   

वो किसी और की  पत्नी थी !
   उस पर  मोहित हो  गया कोई और  !
इस दूसरे ने ---
उसे पाने के लिए "छल" किया
और पहले ने 
 क्रोधित हो शाप दिया !!  
                
सदमा इतना गहरा था कि--
सन्न ! अवाक ! स्पन्दनहीन  !
नारी-देंह "पत्थर" हो गई !!
मौसम बीते ,फिर सहसा --
एक तीसरे के स्पर्श ने ,
पत्थर में" प्राण" फूँक दिए !


वो पत्थर जो अब स्त्री है ,
बैठे -बैठे सोच रही है --
एक ने छला !
एक ने शाप दिया !
और
एक ने जीवनदान !
इन तीन चरित्रों को 
 एक सूत्र में बाँधने वाली
अपनी इस कहानी में
"मैं" कहाँ हूँ ??

ये तो --------
तीन पुरुषों की इच्छा- पूर्ति के
"माध्यम" की कहानी है !!
इसमें " मैं" कहाँ हूँ ???
क्या पुरुष की "इच्छा" ही --
स्त्री की "नियति" है ???

नहीं ! ये मेरी कहानी
नहीं हो सकती !!!
वो उठी ----
उसने "अहिल्या " नाम का
चोला उतारा --
और चल पड़ी -----
अपने "अस्तित्व " की
तलाश में !!!!!
दीप्ति मिश्र