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Wednesday, 27 January 2010

CHAHAT









चाहत 



तुम चाहते हो कि 'मैं'
तुम्हें तुम्हारे लिए  चाहूँ 
क्यों भला ?
क्या कभी 'तुमने' मुझे
मेरे  लिए चाहा ?
नहीं ना !!
दरअसल ये चाहने और ना चाहने 
की ख्वाहिश ही बेमानी है !
बा- मानी है तो बस 'चाहत'
मेरी चाहत 
तुम्हारी चाहत 
या फिर --
किसी और की चाहत ....


दीप्ति मिश्र 
6.8.2005