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Sunday, 20 December 2009

SOCH

सोच

तुम्हारी 'सोच' पर
न तो मेरा अख्तियार था न हक़ !
फिर क्यों तुमने उम्मीद जगा दी
कि तुम भी मेरी तरह सोचोगे  ?

तुमने जताया था,
तुमने बताया था,
तुमने दिखाया था
कि तुम औरों से अलग हो
ठीक मेरी तरह  !!

जानती थी मैं
कि सब छलावा है ! दिखावा है !
मगर फिर भी यक़ीन कर बैठी !
जानते हो क्यों ?
क्यों कि तुम्हारे जुनून की कशिश
मुझे भा गई थी !!

धीरे-धीरे हम क़रीब आते गए
इतने क़रीब कि न चाहते हुए भी
मुझे वो सब नज़र आने लगा
जिसे तुमने बड़े क़रीने से
खुद से भी छुपा रक्खा था !

मैं कब तक आँखें बंद रखती ?
मैनें आँखें खोल दीं ---
और तुम रू-ब-रू हो गए
अपनी हक़ीक़त से !!

मैंने कुछ नहीं जताया
मैंने  कुछ नहीं बताया
मैंने  कुछ नहीं दिखाया

फिर किसलिए -
आज मेरे अख्तियार में है
तुम्हारी 'सोच'
और मुठ्ठी  में है
तुम्हारा पूरा का पूरा
'वुजूद' !!!

दीप्ति मिश्र