Monday, 7 December 2009

DUSTBIN


DUSTBIN


मैं एक --
SOPHISTICATED DUSTBIN हूँ  !
मेरी   SOCIETY के  लोग ,
जब  जी  चाहे ,मुझमें
अपना  कचरा  डाल जातें  हैं
और   ----
साफ़  हो  जाता  है ,
उनका  SO-CALLED घर  !!

लेकिन ----
मुझे  साफ़  करने  के  लिए ,
MUNICIPALITY की  गाड़ी,
नहीं  आती  !

मैं   इस  कचरे  को
खंगालती हूँ ,
छानती हूँ  !
कुछ  अच्छा मिल   जाता  है ,
तो  सहेज  लेती  हूँ  !!
जो  अच्छा  नहीं  होता ,
उसे  RECYCLE कर
स्वच्छ  बना  लेती  हूँ ,
स्वच्छ  हो  जाती  हूँ  !!

लेकिन  कब  तक  ??
कब  तक मैं
दूसरों  के  "विकार "
दूर  करती  रहूंगी  ??
क्या  ऐसा    कोई    पात्र  नहीं
जिसकी  पात्रता  में
"मैं " समा  सकूँ  ???

पागल  हूँ  मैं
एक  DUSTBIN के  लिए --
खोजती  हूँ ------
दूसरा  "DUSTBIN" !!!!

दीप्ति  मिश्र


2 comments:

prashant said...

Very good metaphor :)

ASHISH said...

Diptiji
Thodisi Jaan is missing form this poem. Somehow the depth is not there.