Monday, 7 December 2009

DOHE


दोहे 
*
रिश्तों के बाज़ार में ,चाहत का व्यापार ,
तोल -मोल कर बिक रहे ,इश्क ,मुहब्बत ,प्यार !
*
अपनी -अपनी कल्पना ,अपना -अपना ज्ञान '
जिसकी जैसी आस्था ,वैसा है भगवान् !


1 comment:

ASHISH said...

So true Diptiji.
Few lines have spoken so much.
God bless.