Friday, 18 December 2009

WO NAHEN MERA MAGAR


ग़ज़ल

 वो   नहीं   मेरा  मगर  उस्से  मुहब्बत   है  तो  है
 ये  अगर रस्मों -  रिवाजों  से  बग़ावत  है  तो  है

   सच को मैने सच कहा,जब कह दिया तो कह दिया
   अब  ज़माने  की  नज़र  में  ये   हिमाक़त है तो  है 

     जल  गया परवाना  गर तो  क्या  ख़ता है शम्मा की
     रात भर जलना- जलाना उसकी  क़िस्मत  है  तो  है 

       दोस्त   बन   कर  दुश्मनों  सा  वो   सताता   है   मुझे   
       फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है
 
     कब  कहा  मैनें की वो  मिल जाए  मुझको , मैं  उसे 
      ग़ैर   ना  हो  जाए  वो  बस  इतनी  हसरत है  तो  है 

  दूर  थे  और   दूर  हैं  हर   दम  ज़मीनो  - आसमाँ
   दूरियों  के  बाद  भी   दोनों   में   क़ुर्बत   है  तो  है

दीप्ती मिश्र  

2 comments:

Rohit said...

namaste madam,

takreeban 5 ya 6 saal pahle aapne ye ghazal Jaipur Doordarshan me huye mushaiyare me sunaai thi. Mujhe ye ghazal badi achchhi lagi thi. tab se aajtak kitni hi baar Net pe search kar chuka hun. aur aaj ye talaash poori hui.

humse share karne ke liye shukriya.

me said...

THANKS ROHIT,THANKS A LOT!